दर्द खुद बीमारी बन जाता है, इसे ऐसे रोकें
इलियट क्रेन | Dec 06, 2012, 00:19AM IST
स्पीकर- इलियट क्रेन
प्रोफाइल : स्टैनफोर्ड के एक अस्पताल में पेन मैनेजमेंट सर्विस के निदेशक।
TED पर अब तक 5,60,887 लोग सुन चुके हैं।
मैं एनेस्थीसियोलॉजिस्ट और बच्चों का डॉक्टर हूं। आज मैं आपको यह
बताना चाहता हूं कि दर्द एक बीमारी है। कई बार आप इसे बीमारी के एक लक्षण
के रूप में समझते हैं और यह सही भी हो सकता है। यह ट्यूमर, संक्रमण या
ऑपरेशन का लक्षण हो सकता है। मगर, 10 फीसदी मामलों में जब रोगी इन
बीमारियों से उबरने लगता है तो भी दर्द बना रहता है। यह महीनों या सालों तक
बना रहता है। जब ऐसा होता है तो यह दर्द खुद बीमारी बन जाता है। तो मैं
आपको बताना चाहता हूं कि असहनीय दर्द का रहस्य क्या है और ऐसा होने पर क्या
करें?
इसे घर की वायरिंग की तरह समझ सकते हैं। बिजली के तारों का अंडर
ग्राउंड जाल फैला है। स्विच दबाते ही लाइट ऑन या ऑफ हो जाती है। इसी तरह से
जब आप अपनी अंगुली में हथौड़ा मारते हैं तो आपके हाथों के ये तार (नर्व)
स्पाइनल कॉर्ड में इस सूचना को पहुंचाते हैं। यहां से नए तार, नए नर्व इन
सूचनाओं को दिमाग तक पहुंचाते हैं और आपको पता चलता है कि अंगूठे में चोट
लगी है।
मगर, शरीर में यह स्थिति काफी जटिल होती है। स्पाइनल कॉर्ड में जहां
एक नर्व दूसरी नर्व से जुड़ती है, वहां छोटे-छोटे केमिकल इंफॉर्मेशन के
पैकेट छोड़ती है, जिसे न्यूरोट्रांसमीटर्स कहते हैं। ये अगली कोशिकाओं से
संवाद करती हैं। इन कोशिकाओं को ग्लिएल सेल कहते हैं। दर्द के मामले में ये
ग्लिएल सेल ही उसके अनुभव को बढ़ाती और बदलती हैं। ये कोशिकाएं सक्रिय हो
जाती हैं। उनका डीएनए नए प्रोटीन को सिंथेसाइज करना शुरू करता है और वे
अपने न्यूरोट्रांसमीटर्स को रिलीज करने लगता है। ये न्यूरोट्रांसमीटर्स
दूसरी कोशिकाओं से जुड़ी हुई ग्लिएल कोशिकाओं को सक्रिय करते हैं और ये
प्रक्रिया सकारात्मक फीडबैक का लूप पूरा न होने तक चलती है।
हमारा नर्वस सिस्टम कई बार गलत संदेश ग्रहण करता है। जैसे कोई धीमे से आपको स्पर्श करता है और आपको तेज जलने के साथ दर्द होता है।
इसे ऐसे समझें कि आपके घर की वायरिंग फिर से कर दी जाए। तो बिजली का
स्विच दबाने पर कंप्यूटर की स्क्रीन बंद हो। ये अजीब है, लेकिन असहनीय दर्द
होने पर यही होता है। और यही कुछ समय बाद खुद बीमारी बन जाता है। इसका
इलाज पेनकिलर से किया जा सकता, जो बहुत प्रभावी नहीं है। इसका सबसे अच्छा
तरीका दर्द दे रही नर्व को रोजाना लोकल एनेस्थेटिक्स और फिजिकल थैरेपी देकर
शांत करना और साइकोथैरेपी प्रोग्राम देना है।
क्या पानी के बिना संभव है शरीर की सफाई?
Bhaskar News | Dec 07, 2012
स्पीकर- लुडविक मैरिशेन
प्रोफाइल : ड्राई बाथिंग लोशन बनाने वाले छात्र हैं। 2011 में ग्लोबल स्टूडेंट इंटरप्रेन्योर का खिताब दिया गया।
TED पर अब तक 88,988 लोग सुन चुके हैं।
मैं लिंपोपो में पला-बढ़ा। पानी और बिजली की आपूर्ति यहां उतनी ही
अनिश्चित है, जितना मौसम। खैर, सर्दियों के एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ
सनबाथ ले रहा था। लिंपोपो में सर्दियों में भी सूरज की तपिश काफी होती है।
मेरे करीब बैठे दोस्त ने कहा कि क्या कोई हमारे लिए ऐसी चीज नहीं खोज
सकता, जिससे हम बिना पानी के नहा सकें? उसी समय मैंने घर जाकर इस विषय पर
रिसर्च की, तो चौंकाने वाले आंकड़े मिले।
दुनिया में 2.5 अरब से अधिक लोगों तक पानी और स्वच्छता की पहुंच नहीं
है। कई जगहों पर एक जग पीने का पानी लेने के लिए लोग मीलों दूर जाते हैं,
तो नहाने की बात ही छोड़िए। इनमें से 45 करोड़ लोग तो सिर्फ अफ्रीका में ही
हैं। इस माहौल में कई रोग पनपते हैं। इसमें से सबसे अधिक घातक बीमारी
ट्रेकोमा है। यह बीमारी आंखों में गंदगी के जमा होने पर इंफेक्शन की वजह से
फैलती है। ट्रेकोमा इंफेक्शन होने पर व्यक्ति स्थाई रूप से दृष्टिहीन भी
हो सकता है। इस बीमारी के कारण 80 लाख से अधिक लोग हर साल दृष्टिहीन हो
जाते हैं।
सबसे चौंकाने वाला पक्ष यह है कि ट्रेकोमा से छुटकारा पाने के लिए
किसी दवा या इंजेक्शन की जरूरत नहीं है। यह सिर्फ साफ पानी से आंख धोने से
दूर हो सकती है।
मेरे पास लैपटॉप या इंटरनेट नहीं है। इसके चलते मैंने अपने मोबाइल के
जरिए इंटरनेट पर लोशन, क्रीम, उनके कंपोजिशन आदि की रिसर्च की। इसका
फॉमरूला मैंने कागज पर लिखा। अब मुझे लगा कि इसे क्रियान्वित करने की जरूरत
है। चार साल बाद मैंने 40 पेज का बिजनेस प्लान अपने सेल पर लिखा और इसका
पेटेंट कराया। मैं अपने देश में सबसे युवा पेटेंट होल्डर हूं। मैंने बाथ
सब्स्टीट्यूटिंग लोशन द्वारा दुनिया में पहला ड्राईबाथ का तरीका खोजा है।
इसे त्वचा पर लगाने के बाद नहाने की कोई जरूरत नहीं है।
हाईस्कूल में सीमित संसाधनों के साथ इसे तैयार करने के बाद मैं
यूनिवर्सिटी में गया। लोगों से मिला और इस उत्पाद को पूरी तरह से तैयार
करने के बाद बाजार में पेश किया। हमने महसूस किया कि इस लोशन के प्रयोग से
हम आठ करोड़ लीटर पानी बचा सकते हैं। ड्राई बाथ अमीर लोगों के लिए एक
सुविधा है और गरीब लोगों की जिंदगी बचा सकता है।
एक समय में एक काम करने का आनंद
Bhaskar News | Dec 04, 2012, 00:08AM IST
स्पीकर- पाओलो कार्डिनी
प्रोफाइल : प्रोडक्ट डिजाइनर पाओलो ने अनोखा मोनोटास्क प्रोजेक्ट शुरू किया है।
TED पर अब तक 1,97,238 लोग सुन चुके हैं।
मैं एक प्रोडक्ट डिजाइनर और शिक्षक हूं। मैं मल्टीटास्किंग यानी एक
समय पर एक साथ कई काम करता हूं। मैंने अपने छात्रों को रचनात्मकता और
मल्टीटास्किंग डिजाइन प्रोसेस में काम करने का मौका दिया। मगर, वास्तव में
यह मल्टीटास्किंग कितनी प्रभावी है? क्या मल्टीटास्किंग से आप प्रभावी
परिणाम दे सकते हैं?
थोड़ी देर के लिए मोनोटास्किंग यानी एक समय में एक ही काम के विकल्प
पर गौर कीजिए। चलिए इसके लिए एक उदाहरण लेते हैं। कुछ पकाने, फोन पर बात
करने, एसएमएस लिखने और फोटो अपलोड करने की कोशिश करते हैं। हो सकता है कि
आप ये सारे काम कर सकें, लेकिन क्या सभी काम अच्छी तरह से हो सकेंगे?
कई लोग मल्टीटास्कर्स की बात करते हैं। ऐसे महज दो फीसदी लोग ही
मल्टीटास्किंग के माहौल में अच्छी तरह से काम करने में सक्षम हैं। मगर,
बाकी के बचे हमारे जैसे लोगों और हमारी वास्तविकता के बारे में क्या ख्याल
है?
याद कीजिए जब आखिरी बार आपने सिर्फ अपने दोस्त की बात ध्यान से सुनी
थी? उन बातों का मजा लिया था। यही वो प्रोजेक्ट है, जिस पर मैं काम कर रहा
हूं। सुपर हाइपर मोबाइल फोन ने अपकी जिंदगी के खूबसूरत पलों को जिस तरह से
प्रभावित किया है, मैं उसे कम कराना चाहता हूं।
दूसरा उदाहरण देखिए। क्या आप कभी वेनिस शहर गए हैं? इस द्वीप की छोटी
सड़कों पर खो जाना कितना खूबसूरत है। मगर, हमारी मल्टीटास्किंग की हकीकत
इससे बिल्कुल जुदा है। यह टनों सूचनाओं से भरी पड़ी है। जब मल्टीटास्किंग
में आप पड़ेंगे तो इसकी खूबसूरती को खो देंगे।
ऐसे में अपने एडवेंचर के सेंस को फिर से खोजना कैसा रहेगा? मुझे लगता
है कि जब संभावनाएं काफी अधिक हों तो मोनोटास्किंग की बात करना अजीब लग
सकता है। मगर, मैं आपको एक समय पर सिर्फ एक काम करने या आपके डिजिटल सेंस
को पूरी तरह से बंद करने के लिए प्रेरित करना चाहता हूं।
इससे आप हर पल के खूबसूरत पहलू से रू-ब-रू हो सकेंगे। इन दिनों हर कोई
कुछ न कुछ सजृन या निर्माण कर सकता है। तो अब इस मल्टीटास्किंग की दुनिया
में अपने लिए मोनोटास्क स्पॉट का पता लगाइए और मोनोटास्किंग कीजिए।
झूठ बोलने वाले को तुरंत कैसे पकड़ें
Bhaskar News | Dec 01, 2012, 00:58AM IST
प्रोफाइल : सोशल नेटवर्किग कंपनी की सीईओ
और लेखिका पामेला झूठ पकड़ने में माहिर हैं।
TED पर अब तक 20,47,378 लोग सुन चुके हैं।
मैं आपको एक शोध के बारे में बताना चाहती हूं, जो कहता है कि हर इंसान
झूठा है। कोई अच्छी तरह झूठ बोल लेता है तो कोई खराब, लेकिन बोलते सब हैं।
तो आप व्यक्ति के झूठ को कैसे पहचान सकते हैं? दरअसल, किसी को भी झूठ
पकड़ने की साइंटिफिक नॉलेज नहीं है। वे सच जानने के लिए वैसा ही व्यवहार
करते हैं, जैसे परिपक्व लीडर्स रोजाना करते हैं। झूठ तब ही सच बनता है, जब
सामने वाला उस पर यकीन करने को सहमत हो। यानी झूठ बोलने वाला और उसे सच
मानने वाला, जब दोनों इसमें सहयोग करते हैं, तो वह सच बन जाता है।
यदि कोई आपसे झूठ बोलता है तो वह इसलिए क्योंकि आप उसके झूठ को सच
मानने के लिए तैयार हैं। मगर, कई बार झूठ करोड़ों डॉलर का नुकसान पहुंचा
सकता है। उदाहरण के लिए इनरॉन मडोफ, रॉबर्ट हैंसीन या एल्ड्रिच एम्स, जिसने
अमेरिका को करोड़ों डॉलर का नुकसान पहुंचाया।
हम अच्छे पति, पत्नी, बड़े, अमीर और न जाने क्या-क्या नहीं बनना चाहते
हैं। हमारी कल्पनाओं और सच के बीच के अंतर को भरने के लिए झूठ एक पुल का
काम करता है। एक शोध के अनुसार हम एक दिन में करीब 10 से 200 बार झूठ बोलते
हैं। दो अजनबी एक दूसरे से मिलने के 10 मिनट में पहले से तीन गुना अधिक
झूठ बोलते हैं।
तो क्या करें? दरअसल, झूठ पकड़ने के कुछ तरीके हैं। प्रशिक्षित
लाईपॉटर्स यानी झूठ पकड़ने वाले 90 फीसदी तक झूठ पकड़ लेते हैं। वहीं कुछ
लोग 54 फीसदी तक झूठ पकड़ लेते हैं। इसे सीखना इतना आसान क्यों है? वास्तव
में, अच्छे झूठ बोलने वाले या खराब झूठ बोलने वाले होते हैं। मगर, कोई भी
जन्मजात झूठा नहीं होता। पहला तरीका आप झूठ बोलने वाले के शब्दों पर ध्यान
दें।
वह अनजाने में ही झूठ से अनावश्यक रूप से दूरी बनाता दिखेगा। ऐसे ही
और भी संकेत आपको मिल सकते हैं। दूसरा तरीका, बॉडी लैंग्वेज का है। झूठे
लोग आपसे नजरें मिलाने का दिखावा करेंगे। उनके शरीर का ऊपरी हिस्सा फ्रीज
होगा। वे झूठी हंसी हंसने की कोशिश करेंगे, आवाज धीमी होगी। साइंस ने इसे
पकड़ने के अन्य सूचकों के बारे में भी बताया है। तो जब आप धोखे को पकड़ने
के विज्ञान, सुनने, देखने की कला को साथ मिला देंगे तो आप खुद को झूठ से
दूर रख सकेंगे।
ऑनलाइन अपराधियों पर कसनी होगी नकेल
प्रोफाइल : फिनलैंड के एफ सिक्योर कॉपरेरेशन में चीफ रिसर्च ऑफिसर हैं।
TED पर अब तक 7,69,810 लोग सुन चुके हैं।
इंटरनेट हमारे लिए क्या कुछ नहीं लाया है। कॉन्टेक्ट, मनोरंजन,
व्यापार आदि सभी कुछ तो इससे जुड़े हैं। मुझे यकीनन लगता है कि एक दिन हमें
याद किया जाएगा कि हमारी पीढ़ी ऑनलाइन रही। ये वो पीढ़ी थी, जिसने दुनिया
को वास्तविक और वैश्विक बनाया। मगर, यह भी सच है कि इंटरनेट के साथ सुरक्षा
और गोपनीयता की समस्याएं भी हैं। मैंने इसने लड़ने में अपना काफी समय
लगाया है।
चलो मैं आपको कुछ दिखाता हूं। ये फ्लॉपी ‘ब्रेन’ वायरस से इन्फेक्टेड
है। दुनिया के इस पहले वायरस का पता 1986 में चला था। इसकी जांच के दौरान
मैंने इसे भेजने वाले का नाम, उसकी लोकेशन वगैरह पता की। इसे पाकिस्तान के
बसित और अमजद ने भेजा था। यानी पीसी में वायरस की समस्या आज की नहीं 26 साल
पुरानी है।
80 और 90 के दशक के वायरस वास्तव में उतने खतरनाक नहीं थे। सेंटीपीड
वायरस, क्रैश वायरस या वॉकर वायरस से संक्रमित होने पर आपको इसका पता चल
जाता था। क्योंकि ये स्क्रीन पर दिखाई देते थे। ये वायरस टीनएज लड़कों ने
शौकिया बनाए थे। मगर, आज बनने वाले वायरस शौकिया टीनएज लड़के नहीं बना रहे
हैं। आज कंप्यूटर वायरस की समस्या वैश्विक हो गई है।
तो ये आते कहां से हैं?
दरअसल, संगठित अपराधी गिरोह इन्हें बनाकर पैसे कमा रहे हैं। मॉस्को
में चल रही एक वेबसाइट गैंग्स्टाबग्स डॉट कॉम है। ये लोगों के संक्रमित
कंप्यूटर खरीदते हैं। वैसे अन्य तरीकों से भी ये फायदा ले रहे हैं। जैसे
बैंकिंग ट्रोजन्स। ये ऑनलाइन बैंकिंग करने के दौरान आपके खातों से पैसे
चोरी करता है। या कीलॉगर्स, जो आपके कंप्यूटर में छिपकर आपके द्वारा टाइप
किए गए हर शब्द, हर पासवर्ड को रिकॉर्ड करता रहता है और फिर उन्हें दूर
बैठे अपराधियों को भेज देता है।
ऑनलाइन अपराधियों को पकड़ा नहीं जाता। हमले कहां से हो रहे हैं इसका पता नहीं चलता या देर से चलता है।
तो इसका हल है, अपने डाटा का बैकअप बनाएं। साथ ही ऑनलाइन अपराधियों पर
नकेल कसने के लिए इंटरनेशनल लॉ इन्फोर्समेंट होना चाहिए। यह एंटी-वायरस या
फायरवॉल को यूज करने से अधिक महत्वपूर्ण है।
जटिलता से ही सहज जवाब मिल सकते हैं
भास्कर न्यूज | Nov 29, 2012, 00:18AM IST
स्पीकर- एरिक बलरे
प्रोफाइल : एरिक इकोलॉजिस्ट और नेटवर्क साइंटिस्ट हैं।
TED पर अब तक 6,67,010 लोग सुन चुके हैं।
क्या जब कभी कोई पेचीदा समस्या आती है तो आप बिल्कुल घबरा जाते हैं?
मैं कोशिश करूंगा कि करीब तीन मिनट में इसे बदल सकूं। तो, मैं आशा करता हूं
कि आपको विश्वास दिला पाऊंगा कि जटिल का मतलब हमेशा उलझाऊ नहीं होता।
मैं परिस्थिति-विज्ञानी हूं और इस नाते मैं पेचीदगी का अध्ययन करता
हूं। ये मुझे अच्छा लगता है। मैं प्राकृतिक दुनिया में, प्रजातियों के आपसी
रिश्तों की पेचीदगी का ही अध्ययन करता हूं।
मैं जटिलता के बारे में आपके साथ कुछ खास सूत्र बांटना चाहता हूं। ये
हमने प्रकृति का अध्ययन करके सीखा है। जो शायद कुछ और भी समस्याओं पर लागू
हो सकता है।
पहला, गुड विजुएलाजेशन टूल है। यानी समस्या को साधारण मानिए। इससे
आपको सवाल पूछने का प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे आप सवाल पूछने के लिए आगे
बढ़ने लगेंगे। हो सकता है ये काम आपने पहले कभी न किया हो।
दूसरा, यदि आप किसी समस्या के एक पहलू पर दूसरे पहलू के प्रभाव का
अनुमान लगाना चाहते हैं। और ऐसे में आप सिर्फ एक ही पहलू पर ध्यान दे रहे
हैं तो आपकी सफलता की संभावना कम हो जाएगी। पूरे सिस्टम पर ध्यान देना
जरूरी है। सभी पहलुओं, जगहों, तथ्यों पर ध्यान दीजिए, जो उस समस्या से
जुड़े हैं। हम अपने शोध से पता चला है कि अक्सर आप अपनी समस्या की ओर बस एक
दो कदम ही उठाते हैं। तो जितना आप जटिलता को स्वीकार करेंगे, उतनी ही
सीधे-सादे उत्तर पाने में सफलता की संभावना बढ़ेगी। कई बार ये उन सीधे
जवाबों से अलग होंगे, जिनसे आपने शुरुआत की थी।
जब भी आप किसी जटिल समस्या में हों तो मैं चाहूंगा कि आप डरें नहीं।
इसकी बजाय आप उत्साहित हों। मैं चाहूंगा कि आप राहत महसूस करें क्योंकि
शायद आपको साधारण उत्तर मिलने वाले हैं। प्रकृति के अध्ययन से हमें पता
चलता है कि सहजता अक्सर जटिलता के उस पार ही मिलती है। तो किसी भी समस्या
के लिए यदि आप संपूर्ण जटिलता को स्वीकार करेंगे, तो आप उन तहों तक गहरे
उतर सकेंगे, जिनका महत्व सबसे ज्यादा होगा।
गोपनीयता के खिलाफ एक सशक्त आवाज
स्पीकर- हीथर ब्रूक
प्रोफाइल : सिटी यूनिवर्सिटी लंदन में जर्नलिज्म की प्रोफेसर और पत्रकार ब्रूक सूचना के अधिकार की पैरोकार हैं।
TED पर अब तक 2,55,850 लोग सुन चुके हैं।
पहले दुनिया बड़े परिवार की तरह थी। इसे शक्तिशाली माता-पिता चलाते
थे। लोग असहाय और आशाहीन शरारती बच्चों की तरह थे। अगर कोई माता-पिता के
अधिकारों के बारे में पूछता तो उसे डांट दिया जाता। यदि वे माता-पिता के
कमरों में जाते, तो उन्हें सजा दी जाती।
एक दिन बाहर से एक आदमी माता-पिता के कमरों से चुराए गए गोपनीय
दस्तावेजों के साथ आया। उसमें मैप्स और मिनट्स ऑफ मीटिंग थे। बच्चों ने उसे
देखा और चकित रह गए। क्योंकि माता-पिता भी उनकी तरह ही गलतियां और व्यवहार
कर रहे थे।
अंतर सिर्फ एक ही था, उनकी गलतियों को छिपाया जा रहा था। उस गांव में
एक बच्ची थी, जिसका मानना था कि कुछ भी गोपनीय नहीं होना चाहिए। सारे
दस्तावेजों को पढ़ने का बच्चों को अधिकार होना चाहिए। वो लड़की मैं हूं।
सीकेट्र दस्तावेज, जो मैं चाहती थी वे, ब्रिटिश संसद में रखे खर्चो की
रसीदें हैं। मुझे ये देने में आनाकानी। ऐसा लगा जैसे मैंने न्यूक्लियर बंकर
का कोड मांग लिया हो। इसके लिए मैंने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और जीती।
समस्या ये थी कि संसद ये डाटा मुझे देने में टालमटोल कर रही थी। ताकि
इस दौरान वे ऐसे कानून बना सकें, जिससे पूर्व में हुई गलतियों से वे बच
सकें। लेकिन वे डिजिटाइजेशन को भूल गए थे। इससे सारा डाटा कॉपी कर संसद के
बाहर भेजा जा सकता था। ऐसा हुआ और टेलीग्राफ अखबार ने हफ्तों तक इसके
खुलासे किए। नतीजतन छह मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। ३क्क् सालों में
पहली बार हाउस के स्पीकर को दबाव में इस्तीफा देना पड़ा और पारदर्शिता के
जनादेश पर नई सरकार का गठन हुआ। चार मंत्रियों सहित छह लोगों को जेल हुई।
मूल कहानी पर आते हैं। तथाकथित मां-बाप घबरा गए। उन्होंने सारे दरवाजे
बंद कर दिए। उन्होंने घरों में सीसीटीवी कैमरे लगा दिए। वे जानने की कोशिश
कर रहे हैं कि कौन उनके लिए खतरा बन सकता है। और जो उनके खिलाफ शिकायत
करता है, उसे आतंकवाद के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाता है।
वर्तमान में कई देशों में हमारे अधिकार कमजोर हैं। ब्रिटेन सहित कई
देशों में ऑफिशियल सीक्रेट कानून हैं। इसका उल्लंघन करने पर लोगों को सजा
दी जाती है। तो इसका हल क्या है? मेरा मानना है कि सूचना के अधिकार का
कानून होना चाहिए। हमें इस दिशा में काम करना है।
अवसाद से घिरे लोगों से बात कीजिए
भास्कर न्यूज | Nov 26, 2012, 00:06AM IST
स्पीकर- जे डी शेरेम
प्रोफाइल : स्टैनफोर्ड बिजनेस मैनेजमेंट स्कूल में व्याख्याता और उद्यमी हैं।
TED पर अब तक 3,82,790 लोग सुन चुके हैं।
बाहरी दिखावे के लिए जरूरी सब चीजें जॉन के पास थीं। उसने पांच साल
पहले न्यूयॉर्क में खरीदे घर को काफी अच्छी कीमत पर बेचने के लिए हाल ही
में कॉन्ट्रेक्ट किया था। जॉन ने जिस स्कूल से स्नातक की उपाधि ली थी, वहां
उसे पढ़ाने लिए प्रस्ताव मिला था। वहां उसे वेतन और अन्य लाभ भी मिलने
वाले थे। फिर भी खुद से संघर्ष करता जॉन अवसाद में घिरता जा रहा था।
मैनहट्टन पुल की दीवार पर जॉन 11 जून 2003 की रात को चढ़ गया। उसने
पानी में छलांग लगा दी, लेकिन चमत्कारिक रूप से बच गया। छलांग लगाने से
उसका दायां हाथ और पसलियां टूट गईं। फेफड़ों में छेद हो गया और बेहोशी में
वो बहता हुआ ईस्ट रिवर तक पहुंच गया। स्टेटन आइलैंड फेरी के यात्रियों ने
दर्द से कराह रहे जॉन की आवाज सुनी। यात्रियों ने इसकी सूचना फेरी के
कप्तान को दी। जॉन को पानी से बाहर निकाल कर बेल्यूवे अस्पताल में भर्ती
कराया गया।
यहां से हमारी कहानी शुरू होती है। जब जॉन अपने जीवन को वापस पाने के
लिए प्रतिबद्ध हुआ। पहले शारीरिक रूप से फिर भावनात्मक रूप से, और फिर
आध्यात्मिक रूप से। तब उसने पाया कि उसकी तरह आत्महत्या की कोशिश करने वाले
लोगों के लिए बहुत कम मौके उपलब्ध थे। शोध के अनुसार, आत्महत्या की कोशिश
करने वाले 20 में से 19 व्यक्ति विफल होते हैं। इन विफल होने वालों के
दूसरे प्रयास में सफल होने की संभावना 37 गुना अधिक होती है।
ये सच में संकट में फंसे लोग हैं। जब ये लोग फिर से जिंदगी से जुड़ने
की कोशिश करते हैं तो आत्महत्या से जुड़े अलगाव के कारण हमें पता नहीं होता
कि क्या कहें। इसलिए हम अक्सर चुप रहते हैं। ये चुप्पी अकेलेपन को और भी
बढ़ाती है, जिसमें जॉन जैसे लोग खुद को पाते हैं।
जॉन की कहानी मैं अच्छे से जानता हूं क्योंकि मैं ही जॉन हूं। मैंने
आज एक अलग तरह के एकांत से बाहर आने का फैसला किया है। ताकि आप लोगों को
प्रोत्साहित कर सकूं। आपसे आग्रह कर सकूं कि यदि आप ऐसे किसी व्यक्ति को
जानते हैं, जिसने आत्महत्या की कोशिश की है या जो ऐसा विचार कर रहा है तो
उससे बात कीजिए। सहायता कीजिए। यह एक अमूल्य वार्तालाप है और एक बांटने
योग्य विचार है।
भूख से निपटने की प्रौद्योगिकी मौजूद है
स्पीकर- जोसेट शीरन
प्रोफाइल : संयुक्त राष्ट्र खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुकीं हैं।
TED पर अब तक 7,74,160 लोग सुन चुके हैं।
मैंने व्यापार के क्षेत्र में काफी साल बिताए। इसके बाद चार साल पहले
मैं उन जगहों पर गई जहां लोग जिंदा रहने के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें
एक वक्त का खाना भी नहीं मिल रहा है। यह लाल कप रवांडा के फेबियन नामक
लड़के का है।
इसे मैं प्रतीक के रूप में साथ ले आई। सच में यह चुनौती भी है और आशा
भी। क्योंकि दिन में एक प्यालाभर खाना फेबियन की जिंदगी पूरी तरह बदल देता
है। मैं आज इस हकीकत पर बात करना चाहूंगी कि दुनिया में एक अरब लोग या कहें
हर सात में से एक व्यक्ति यह जाने बिना सुबह जगता है कि इस प्याले को कैसे
भरें। दरअसल, हर दस मिनट में भूख के कारण एक बच्चा मर जाता है। यह एड्स,
टीबी, मलेरिया से होने वाली कुल मौतों से अधिक है।
आपको इसकी परवाह क्यों होनी चाहिए? कई लोगों ने शायद खुद या उनके
माता-पिता, दादा-दादी ने भूख का अनुभव किया होगा। कुछ लोग यह मानते हैं कि
भूखों के साथ हमदर्दी से पेश आना इंसानियत का एक बुनियादी फर्ज माना जाना
चाहिए।
जैसे गांधीजी ने कहा, ‘भूखे की नजर में रोटी का टुकड़ा ईश्वर का चेहरा
है। अन्य लोग दुनिया की शांति, सुरक्षा व स्थिरता के बारे में चिंतित हैं।
हमने देखा है 2008 के दंगों को, जो खाने के अभाव से हुए। जब रातों रात
खाद्य-पदार्थो के दाम दोगुने हो गए थे। सभ्यता के मूलभूत कर्तव्यों में से
एक है यह सुनिश्चित करना कि लोगों को पर्याप्त खाना मिले।
भूख के साथ समझौता नहीं कर सकते। लोगों को भोजन चाहिए ही। 1987 में
पहली बार मां बनने पर जब मैं बच्चे को दूध पिला रही थी, तब ऐसा ही एक चित्र
टीवी पर दिखा। इथियोपिया में फिर सूखा पड़ा था। इससे दो साल पहले वाले
सूखे से दस लाख से अधिक लोग मरे थे। मगर मैं इस चीज से कभी इतनी प्रभावित
नहीं हुई, जैसे उस पल हुई। क्योंकि उस चित्र में एक महिला अपने बच्चे को
दूध पिलाने की कोशिश कर रही थी और उसके पास पिलाने के लिए दूध नहीं था।
एक मां के रूप में उस बच्चे के रोने की आवाज ने मुझे भीतर तक आहत कर
दिया। यह कोई अजीब बीमारी नहीं है, जिसका इलाज हमारे पास नहीं है। पर आज हम
भूख का इलाज जानते हैं। अब वाकई हमारे पास जरूरी प्रौद्योगिकी और
व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इनके प्रयोग से सबके लिए अन्न पैदा कर उन्हें भूख से
बचा सकते हैं।
आंकड़े बदल देंगे दुनिया देखने का नजरिया
स्पीकर- हैंस रोस्लिंग
प्रोफाइल : स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट में ग्लोबल हैल्थ के प्रोफेसर हैं।
TED पर अब तक 46,69,009 लोग सुन चुके हैं।
करीब 10 साल पहले मुझे स्वीडन के अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट्स को ग्लोबल डेवलपमेंट के बारे में पढ़ाने को कहा गया।
अफ्रीकन इंस्टीट्यूट में अफ्रीका में भूख की स्थिति को पढ़ाते हुए 20
साल बिताने के बाद ये मौका मिला था। इसलिए मुझे लग रहा था कि मैं दुनिया के
बारे में थोड़ा बहुत जानता हूं। मगर, जब आपको ऐसे मौके मिलते हैं तो आप
थोड़ा नर्वस हो जाते हैं। अच्छे ग्रेड वाले स्वीडिश छात्रों के बारे में
मैंने सोचा कि उन्हें अच्छी जानकारी होगी। इसलिए मैंने उनका प्री-टेस्ट
लिया।
जिन प्रश्नों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला उनमें से एक था- ‘इन
पांच जोड़ों में से कौन से देश की बाल मृत्युदर सबसे अधिक है?’ यहां मैं
आपकी परीक्षा नहीं लूंगा। यह देश टर्की है, जिसकी बाल मृत्युदर पोलैंड,
रूस, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका की अपेक्षा अधिक है।
स्वीडिश छात्रों के परिणाम पांच जवाबों में से 1.8 सही थे। देर रात,
जब मैं रिपोर्ट इकट्ठी कर रहा था तो मैंने अपनी खोज के बारे में महसूस
किया। स्वीडन के छात्र दुनिया के बारे में गणना के आधार पर चिंपैंजी से भी
कम जानते हैं। समस्या ज्ञान की कमी नहीं, पूर्व कल्पना के विचार की थी।
मैंने कारोलिंसका के प्रोफेसरों का भी अध्ययन किया और वे भी चिंपैंजी के
जैसे ही थे। तभी मुझे अहसास हुआ कि दुनिया में क्या हो रहा है, इसके आंकड़े
और हर देश के बच्चे के स्वास्थ्य के बारे में जानने की जरूरत है।
तो हमने सांख्यिकी के साथ एक सॉफ्टवेयर बनाया। इसमें हर देश एक
बुलबुला और उसका आकार देश की जनसंख्या को दर्शाता है। यदि हम आंकड़े पर
नज़र न डालें तो, एशिया में हुए आश्चर्यजनक बदलाव को हम कम आंकते हैं।
नीति-निर्माता और व्यावसायिक क्षेत्र भी यह जानना चाहते हैं दुनिया
कैसे बदल रही है? तो हम उन आंकड़ों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते जो हमारे
पास हैं? हमारे पास ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र, राष्ट्रीय सांख्यिकी
एजेंसियों, विश्वविद्यालय और गैर-सरकारी संगठनों में मिल सकते हैं। ये
आंकड़े डेटाबेस में हैं और लोग इन्हें इंटरनेट पर देख सकते हैं। फिर भी हम
उनका प्रभावपूर्ण तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। जबकि इससे दुनिया
को देखने का हमारा नजरिया बदल सकता है।
पर्याप्त विकल्प न देकर भी खुश रखें लोगों को
स्पीकर- टिम लेबरचेट
प्रोफाइल : ग्लोबल डिजाइन एंड इनोवेशन फर्म फ्रॉग के चीफ मार्केटिंग ऑफिसर व लेखक हैं।
TED पर अब तक 2,47,582 लोग सुन चुके हैं।
कर्मचारियों और उपभोक्ताओं पर कंपनियां नियंत्रण खो रही हैं। कंपनी की
प्रतिष्ठा और ब्रांड के प्रति लोगों की वफादारी डगमगा रही है। हाल ही में
एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि 27 फीसदी बॉस मानते हैं कि कर्मचारी उनकी
फर्म के प्रति वफादार हैं। हालांकि, महज चार फीसदी कर्मचारी ही इस बात पर
सहमत हुए कि वे कंपनी के प्रति वफादार हैं।
पहले कर्मचारियों व उपभोक्ताओं को नियंत्रण दें। उन्हें बातचीत में
शामिल करें। उन्हें क्रिएटिव आइडिया, नॉलेज, कंटेंट डिजाइन और प्रोडक्ट के
साथ जोड़ें। उन्हें कीमत के निर्धारण का मौका दें। रेडियोहेड बैंड ने ‘इन
रेनबोज’ एलबम रिलीज किया। उन्होंने जितना चाहें उतना भुगतान करने की
उपभोक्ताओं को छूट दी। यह अनोखा ऑफर सीमित समय के लिए था। मजे की बात है कि
बैंड ने पिछले एलबम की तुलना में इस एलबम की अधिक कॉपी बेचीं।
शोधकर्ताओं के अनुसार कर्मचारियों को काम पर अधिक अधिकार देने से वे
खुश होते हैं। इससे उनकी उत्पादकता बढ़ती है। ब्राजील की कंपनी सैम्को
ग्रुप ने कर्मचारियों को अपने काम का शेड्यूल और वेतन खुद तय करने की छूट
दी। हुलु और नेटफ्लिक्स ने वेकेशन पॉलिसी शुरू की।
बिजनेस का पारंपरिक ज्ञान कहता है कि प्रत्याशित व्यवहार से विश्वास
कमाया जा सकता है। लेकिन जब सब कुछ स्थिर और मानकों के आधार पर पहले से तय
है तो आप लोगों को अच्छा अनुभव कैसे देंगे?
लोगों को अधिक आजादी दिए बिन खुश करने के लिए ट्रेवल सर्विस
नेक्सपिडिशन का उदाहरण लेते हैं। वह ट्रिप को सरप्राइज ट्विस्ट से एक खेल
में बदल देती है। वे यात्री को आखिरी समय तक नहीं बताती है कि वे कहां जा
रहे हैं। नीदरलैंड्स की एयरलाइन केएलएम ने सरप्राइज कैंपेन शुरू किया। वह
यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचने से पहले सरप्राइज गिफ्ट देती है।
तो क्या ऐसे ही कंपनियां कुछ मौकों पर कर्मचारियों का दबाव कम कर सकती
हैं। हां, वे दूसरों को मदद करने के लिए प्रेरित कर ऐसा कर सकती हैं। शोध
के अनुसार, कभी-कभी परोपकारी काम करने से लोगों की उत्पादकता बढ़ती है।
कंपनी अपने भाग्य की निर्माता खुद हैं, ऐसे में उन्हें तय करना है कि
उन्हें कर्मचारियों और उपभोक्तओं को कितना नियंत्रण देना है।
No comments:
Post a Comment