Wednesday, 24 October 2012

बेस्ट स्पीच: ऐसे मजबूत होती जाती है आपकी याददाश्त


 


स्पीकर- नील बर्गेस
प्रोफाइल : लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में पढ़ा रहे नील बर्गेस मस्तिष्क तरंगों के आधार पर याददाश्त से जुड़े प्रयोग कर रहे हैं.
TED पर इसे अब तक 4,92,585 लोग सुन चुके हैं।
आखिर वह क्या है, जो हमें कुछ याद रखने में मदद करता है। मसलन कार को पार्क करने की जगह से लेकर दिशाओं और गति को याद रखने में? हमारे दिमाग का एक हिस्सा होता है, हिप्पोकैंपस, जो यादों को सहेजता है। इसमें उसकी मदद करते हैं न्यूरॉन। मानव मस्तिष्क में हजारों करोड़ न्यूरॉन्स होते हैं, जो एक-दूसरे से विद्युत तरंगें भेजकर बातें करते हैं।
कई तरह के प्रयोग कर हम कुछ निष्कर्षों पर पहुंचे। सोचिए कैसे? जैसे चूहा जब किसी स्थान पर पहुंचता है, तो न्यूरॉन उसके बारे में हिप्पोकैंपस को संकेत भेजता है। वह स्थान हिप्पोकैंपस में अंकित हो जाता है।
यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहती है। यानी चूहा जहां-जहां जाता है, उसके बारे में एक नक्शा सा तैयार होता जाता है। चूंकि चूहों की ही तरह ही हमारा दिमाग भी होता है, जो इसी कार्यप्रणाली पर काम करता है। ऐसे में आवागमन की यादें मुनष्य के दिमाग की कोशिकाओं में याद रह जाती है। इसमें न्यूरॉन मदद करते हैं।
सिर्फ आने-जाने के स्थानों के बारे में ही नहीं। हम किसी स्थान से अब कितनी दूर आ चुके हैं, इसकी जानकारी भी न्यूरॉन हिप्पोकैंपस को देता है। इस तरह हम कार के पार्क करने की जगह भी भूल नहीं पाते।
किसी स्थान को याद रखने में हमारे द्वारा अपनाई गई गति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मसलन किसी खास स्थान पर कार पार्क करने के बाद हम अपने निश्चित गंतव्य पर पैदल चलकर ही पहुंचते हैं। उस दूरी को तय करने के लिए हमारी चाल की एक निश्चित गति होती है। इस गति से भी हम तय स्थान पर पहुंच जाते हैं। कैसे? जरा याद करें कि आप कहीं रात को गए होंगे? दोबारा कुछ दिन बाद रात को उसी जगह पर जाना है। आप एक रास्ता चुनते हैं। उसपर चलते हुए विभिन्न मोड़ तय करते हैं। साथ ही कहते जाते हैं कि कुछ ही मिनट में अगला मोड़ आएगा। यह दूरी हम गति के आधार पर जानते हैं, जिसे हमारे दिमाग के न्यूरॉन याद रखते हैं।

इस तरह हमारे दिमाग में एक ग्रिड बनती है। हम जब उसी स्थान पर दोबारा जाते हैं, तो ग्रिड पुरानी विद्युत तरंगों के आधार पर रास्ते को तलाश करती है। इसे ही हम सरल भाषा में किसी जगह से जुड़ी याददाश्त कहते हैं। अब हम दिमाग की बाकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए भी कुछ और ऐसे ही प्रयोग करने जा रहे हैं। इसके बल पर हम एक दिन मानव मस्तिष्क की पूरी गुत्थी सुलझा लेंगे।
 
 
 

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