Tuesday, 16 October 2012

असहमत होने की हिम्मत करें

स्पीकर मार्गरेट हे | Oct 03, 2012, 04:57AM IST
 


प्रोफाइल : टीवी प्रोड्यूसर और लेखक हैं। कॅरिअर बीबीसी में टीवी प्रोडक्शन से शुरू किया था। वहां उन्होंने कई रिकॉर्ड बनाए । वे एक वेब कंपनी की सीईओ भी रहीं। फिलहाल वे सीमन्स कॉलेज ऑफ बोस्टन में प्रोफेसर हैं। इसके साथ ही हफिंगटन पोस्ट और बी नेट के लिए ब्लॉग लिखती हैं। न्यूक्लिअर डिजास्टर पर उनकी किताब फुकुशिमा डायची को टाइम गोल्डमैन सैक बेस्ट बिजनेस बुक अवार्ड 2011 मिला है।






क्यों पढ़ें : TED पर इसे 5 लाख 46 हजार लोग सुन चुके हैं।

मैं अपने कॅरिअर का एक खास अनुभव आपसे शेअर करने जा रही हूं। ‘जो’ नाम के एक व्यक्ति के साथ मैं काम कर चुकी हूं। वह एक मेडिकल डिवाइस कंपनी में एग्जीक्यूटिव था। उन दिनों वह किसी डिवाइस पर काम कर रहा था। उसे लगा कि डिवाइस में कुछ खामियां हैं,जो लोगों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इससे वह परेशान था। वह नहीं चाहता था कि किसी को नुकसान हो, लेकिन उसकी कंपनी में इस बात पर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। उसे लग रहा था कि सीनियर्स उससे ज्यादा जानते हैं। इसी डर से उसने यह बात नहीं उठाई। बस इस उलझन में उसने नौकरी छोड़ने का विचार किया। उसे और कोई विकल्प नहीं सूझा।




तब मैंने उसकी मदद की। इसके बाद वही हुआ जैसा कि कॉपरेरेट कल्चर में होता है। ‘जो’ की बात किसी तरह कंपनी के लोगों तक पहुंच गई। इस बात को जानने के बाद उस कंपनी में हर किसी के दिमाग में वही सवाल शुरू हुए जो जो के दिमाग में उथल-पुथल मचा रहे थे। अब वह अकेला नहीं था। उसके साथ ऐसे लोग जुड़ गए थे। जो उस डिवाइस की खामियों का हल सोचने में लगे थे। काफी विवाद हुआ। हर व्यक्ति ने अपने विचार रखे। यह था असहमति जताने का फायदा। अगर हमें कुछ ऐतिहासिक करना है तो यह काम चुप बैठकर नहीं हो सकता।





ऐसा ही एक और उदाहरण मैं आपको बताती हूं। 50 के दशक में एक बेहतरीन डॉक्टर थी, डॉ. एलिस स्टीवर्ट। डॉ. एलिस का कहना था गर्भवती महिलाओं का बार-बार एक्स रे ही बच्चों में कैंसर का कारण बन रहा है। कई लोगों ने उनका विरोध किया। लेकिन समस्या यह थी कि वे खुद को सही कैसे सिद्ध करें। इसका एक बेहतरीन तरीका उनके पास था ‘मॉडल ऑफ थिंकिग’। वह था उनके दोस्त जॉर्ज नील, जो एक सांख्यिकी विशेषज्ञ भी थे। जॉर्ज वह सब जानते थे जो कि एलिस को नही पता था। जहां एलिस अपने मरीजों से दिल से जुड़ती थी। वहीं जॉर्ज के लिए वो सिर्फ एक नंबर की तरह थे।






उनका काम था डॉ. एलिस को गलत साबित करना। वे हर मॉडल पर अध्ययन करते। आंकड़े खंगालते। ऐसे तथ्य ढूंढ़ते जो डॉ. एलिस को गलत साबित कर सकें। इससे एलिस को एक विश्वास हमेशा रहता था कि वो कभी गलत साबित नही होंगी। क्योंकि वो डॉक्टर जॉर्ज के साथ कॉलेबरेशन मॉडल पर काम कर रही थीं। जॉर्ज बताते थे कि उनका मकसद यह नहीं था कि वे हमेशा एलिस को गलत साबित करें।





बल्कि एक विश्वास देना था कि वह गलत नहीं थी। जॉर्ज के रहते डॉ.एलिस गलत नहीं ठहराई गईं। क्योंकि उन्होंने हमेशा अपनी असहमति खुलकर जताई थी। यही वो काम है जो पूर्व,पश्चिम और कोरिया के लोगों या सभी को करना चाहिए। हमें गलत होने की आशंका को भी अपनाना होगा। ताकि हम हमेशा ही सही रहें।

No comments:

Post a Comment