बेस्ट स्पीचः डांस से प्रेरणा लेकर कैंसर को दी मात
स्पीकर- आनंदा शंकर जयंत
प्रोफाइल : भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी में पारंगत आनंदा लिंगभेद के खिलाफ भी काम कर रही हैं।
क्यों पढ़ें : इसे TED पर अब तक 2,31,824 लोग सुन चुके हैं।
जुलाई 2008 में जो मैंने सुना, उसके लिए कतई तैयार नहीं थीं। डॉक्टर के केबिन से ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज और ग्रेड जैसे शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह उतर रहे थे। डांसर होने के नाते मुझे लगता था कि मैं नवरस जानती हूं, लेकिन उस दिन मुझे पहली बार ‘भय’ सही मायने में महसूस हुआ। मैंने घर लौटकर पति जयंत से कहा कि मेरी तो दुनिया ही खत्म हो गई। जवाब में जयंत ने मुझसे कहा, ‘यह जिंदगी में आने वाली एक छोटी सी रुकावट है। तुम इसे पार कर वह सब कुछ कर सकोगी, जो तुम्हें अच्छा लगता है।’
इसके बाद मुझे ऐसे सहारे की जरूरत थी, जो मुझे इस अंधकार से बाहर निकाल सके। तब मुझे डांस का ख्याल आया। इसके बारे में जितना सोचा, उतनी अंदर से दृढ़ता महसूस हुई। कैंसर के इलाज से कमजोरी आ रही थी, लेकिन मन में विचार उठता था, ‘आनंदा तुम बगैर रुके कई-कई घंटे डांस कर सकती हो। फिर ये थकान कैसी?’ इसने मुझे डांस स्टूडियो में समय बिताने को प्रेरित किया।
मैं डांस स्टूडियो में घंटों बैठे रहकर पुरानी यादें ताजा करती। फिर धीरे-धीरे मैंने डांस की शुरुआत की। मुझे बचपन याद आता था, जब कुछ देर में थक जाती थी। आज भी वही स्थिति है, थोड़ी देर डांस करते ही थकान आ जाती है। थकान को बचपन की तरह नजरअंदाज कर मैंने मुद्राओं, हाव-भाव पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया।
एक तरह से मैंने जितना कुछ सीखा था, उन दिनों उन सबका रिवीजन कर रही थी। धीरे-धीरे मैं नकारात्मक सोच के दायरे से बाहर निकल आई। लेकिन मुझे कैंसर से पार पाने के लिए कुछ अतिरिक्त प्रेरणा की जरूरत थी। यह मिली महिषासुरमर्दिनी मुद्रा से। मां दुर्गा के इस अवतार ने मेरे भीतर अदम्य साहस का भी संचार किया। इसके बलबूते मैं सर्जरी और कीमोथैरेपी की कमजोरी के बावजूद घंटों डांस करने लगी थी। मेरे अंदर आ रहे इस सुधार से डॉक्टर अचंभित थे। तब मैंने उन्हें बताया कि मैंने ठान लिया था कि कैंसर मेरी जिंदगी का एक पन्ना जरूर हो सकता है, लेकिन पूरी जिंदगी इसकी भेंट नहीं चढ़ सकती। मेरे जीवन का वह कठिन दौर चुनौतियों से पार पाने में वैचारिक शक्ति की अहमियत को बताता है।
प्रोफाइल : भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी में पारंगत आनंदा लिंगभेद के खिलाफ भी काम कर रही हैं।
क्यों पढ़ें : इसे TED पर अब तक 2,31,824 लोग सुन चुके हैं।
जुलाई 2008 में जो मैंने सुना, उसके लिए कतई तैयार नहीं थीं। डॉक्टर के केबिन से ब्रेस्ट कैंसर, स्टेज और ग्रेड जैसे शब्द कानों में पिघले सीसे की तरह उतर रहे थे। डांसर होने के नाते मुझे लगता था कि मैं नवरस जानती हूं, लेकिन उस दिन मुझे पहली बार ‘भय’ सही मायने में महसूस हुआ। मैंने घर लौटकर पति जयंत से कहा कि मेरी तो दुनिया ही खत्म हो गई। जवाब में जयंत ने मुझसे कहा, ‘यह जिंदगी में आने वाली एक छोटी सी रुकावट है। तुम इसे पार कर वह सब कुछ कर सकोगी, जो तुम्हें अच्छा लगता है।’
इसके बाद मुझे ऐसे सहारे की जरूरत थी, जो मुझे इस अंधकार से बाहर निकाल सके। तब मुझे डांस का ख्याल आया। इसके बारे में जितना सोचा, उतनी अंदर से दृढ़ता महसूस हुई। कैंसर के इलाज से कमजोरी आ रही थी, लेकिन मन में विचार उठता था, ‘आनंदा तुम बगैर रुके कई-कई घंटे डांस कर सकती हो। फिर ये थकान कैसी?’ इसने मुझे डांस स्टूडियो में समय बिताने को प्रेरित किया।
मैं डांस स्टूडियो में घंटों बैठे रहकर पुरानी यादें ताजा करती। फिर धीरे-धीरे मैंने डांस की शुरुआत की। मुझे बचपन याद आता था, जब कुछ देर में थक जाती थी। आज भी वही स्थिति है, थोड़ी देर डांस करते ही थकान आ जाती है। थकान को बचपन की तरह नजरअंदाज कर मैंने मुद्राओं, हाव-भाव पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया।
एक तरह से मैंने जितना कुछ सीखा था, उन दिनों उन सबका रिवीजन कर रही थी। धीरे-धीरे मैं नकारात्मक सोच के दायरे से बाहर निकल आई। लेकिन मुझे कैंसर से पार पाने के लिए कुछ अतिरिक्त प्रेरणा की जरूरत थी। यह मिली महिषासुरमर्दिनी मुद्रा से। मां दुर्गा के इस अवतार ने मेरे भीतर अदम्य साहस का भी संचार किया। इसके बलबूते मैं सर्जरी और कीमोथैरेपी की कमजोरी के बावजूद घंटों डांस करने लगी थी। मेरे अंदर आ रहे इस सुधार से डॉक्टर अचंभित थे। तब मैंने उन्हें बताया कि मैंने ठान लिया था कि कैंसर मेरी जिंदगी का एक पन्ना जरूर हो सकता है, लेकिन पूरी जिंदगी इसकी भेंट नहीं चढ़ सकती। मेरे जीवन का वह कठिन दौर चुनौतियों से पार पाने में वैचारिक शक्ति की अहमियत को बताता है।
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